तलवार छोड़ तराजू पकड़ने वालो संतों, तीर्थों, परिवार की सुरक्षा के लिए तलवार पकड़ना जरूरी है- आचार्य श्रुतसागर

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12 जुलाई 2025 / श्रावण कृष्ण दौज/चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
रविवार 06 जुलाई को वर्षायोग स्थापना से ठीक एक दिन पहले सान्ध्य महालक्ष्मी टीम पहुंची आचार्य श्री श्रुतसागरजी के पास, जो नजफगढ़ की भरत क्षेत्र में परिक्रमा लगाने के लिये बढ़े ही थे कि ‘नमोस्तु गुरुवर’ के साथ जैसे हमने उनको आगे बढ़ने से रोक दिया और उन्होंने तख्त पर बैठते ही कहा कि अब तीर्थों की सुरक्षा की बात करना जरूरी हो गया है। इसीलिये यहां कल स्थापना में ‘तीर्थ सुरक्षा कलश’ भी रखा जाएगा, और इस तरह की शुरूआत हर वर्षायोग समिति को करना चाहिये, जिससे तीर्थक्षेत्र कमेटी उस राशि का सदुपयोग प्राचीन तीर्थों के जीर्णोद्धार और सुविधा में लगे। हमारी पुरातन संस्कृति की पहचान इन्हीं प्राचीन तीर्थों से होती है।

फिर चर्चा शुरू हुई वर्षायोग पर, 38वां चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री श्रुतसागरजी ने कहा कि जैन योग में बहिरात्मा से अंतरात्मा तत्व को प्राप्त करना, अंतरात्मा से परमात्मा तत्व को प्राप्त करना परम लक्ष्य है, वही मोक्ष है। वर्षायोग परम आध्यात्मिक साधना का समय है। वातावरण में नमी के बढ़ने से जीव जंतु उत्पन्न होते हैं। उनसे नाना प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती हैं। उन जीवों की रक्षा के लिए एवं उन जीवों से स्वयं की रक्षा के लिये वर्षायोग का सूत्रपात किया गया है।

उन्होंने कहा कि हम अध्यात्म के साथ वर्षायोग में स्वयं की उन्नति, समाज की उन्नति, तीर्थों के उद्धार, देश-राष्ट्र के प्रति प्रेमभाव व्यवहार में अनेकांत-स्याद्वाद, अनेकता में एकता का सूत्रपात। जैन दर्शन में भावों की विशुद्धि, सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति दया, करुणा, मैत्री का भाव प्रमुख उद्देश्य है। श्वेताम्बर और दिगंबर दोनों शास्त्रों में 10 प्रकार के कल्प बताये हैं। उन सबमें से महत्वपूर्ण ‘पर्यूषण कल्प’ उसी को चातुर्मास कहते हैं, वर्षायोग का असली नाम पर्युषणकल्प है।

तरंगों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जैन धर्म का सार नाद योग है। नाद योग का सार ओंकार रूप दिव्य ध्वनि है। मंदिर में घंटा भी नाद योग की दिव्य ध्वनि का पात्र है। हर जीव में एक प्रीक्वेंसी होती है। फ्रींक्वेंसी यानि तरंग और जैन धर्मानुसार ऐसी तरंगों से आस्रव होता है, बंध होता है और उन्हीं से संवर और निर्जरा होती है। उसी को सयोग केवली का 13वां गुणस्थान प्राप्त होता है। साधु से पशु तक को ‘निर्विचार’ कुछ क्षण होता है। 7वें गुण स्थान में निर्विकल्प होता है। अनहद नाद हर जीव में विद्यमान है। उसको ध्यान से देखेंगे तो कर्ण दर्शन से उस शब्द का अनुभव किया जाता है। आत्म प्रदेश के परिस्पंदन से उत्पन्न दिव्यध्वनि, काय, वांग, मन कर्मयोग हैं, जैसा तत्वार्थ सूत्र के छठे अध्याय के पहले सूत्र में लिखा है।

ईश्वर की भूमिका पर उन्होंने कहा कि जैन धर्म में ईश्वर को कर्ता नहीं, प्रेरक मानते हैं, उदासीन मानते हैं, उनके स्मरण से हम स्वयं खड़े हो जाते हैं। स्वयं पुरुषार्थ कर प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रोग्रेस कर सकता है। ईश्वर की प्रबल प्रेरणा रहती है, हर समय ईश्वर अपने साथ है। इसलिये अच्छा बोले, अच्छा करो, इसी से अंतरात्मा में परमात्मा का अनुभव करना, निरंतर कर्म, मन, चेतन को पवित्र रखना।

आज की कायरता पर उन्होंने कहा कि जैन क्षत्रियों का धर्म है, पर अब तलावर को छोड़ तराजू पकड़ लिया। अहिंसा का मतलब कायरता नहीं है। तलवार अपने परिजनों की, तीर्थों की, संतों की रक्षा के लिए पकड़ना जरूरी है, इसलिये प्रथम महाराजा श्री आदिनाथ जी ने सबसे पहले ‘असि’ का उपदेश दिया।

गिरनार-शिखरजी आदि तीर्थों पर पुजारी व सुरक्षाकर्मियों की व्यवस्था कराना जरूरी है। चर्चा आगे बढ़ती, तभी आहार के लिये जल लेकर श्रद्धालुओं की कतार खड़ी हो गई। बस यही पर चर्चा में विराम लग गया।