रिश्ते ताले की तरह होते हैं, जिन्हें चाबी से खोलते हो, तो हर बार काम आयेंगे और हथौड़े से खोलोगे तो एक बार काम आयेंगे।
आज संयुक्त परिवार एकल में बिखर रहे हैं, इसमें जानवरों जैसी प्रकृति दिखाई देती है।
लोगों की जुबां पर तब तक आपका नाम रहेगा, जब तक तुमसे उनका काम रहेगा।
आज मोबाइल आदमी के हाथ में नहीं रहता, बल्कि मोबाइल आदमी को हाथ में रखता है।
रिश्तों को बिगाड़ने का काम उसके सगे मां-बाप भी करते हैं। जैसे दही को जमाने के लिये बार-बार अंगुली नहीं करते, उसी तरह अपनी बेटी के घर में, उसके जीवन में, बार-बार अंगुली नहीं कीजिए।
05 नवंबर 2025 / कर्तिक शुक्ल पूर्णिमा /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
भाई दूज का त्यौहार कभी जैन मंच पर मनाया हो, ऐसा पहली बार हुआ अहमदाबाद में, जहां आचार्य श्री सुनील सागरजी ने रिश्तों में आती दरारें, बिखरते परिवार, बढ़ती दूरियां, खत्म होता अपनापन जैसी समस्याओं को दूर करने के लिये यह अनूठा प्रयास समाज व कमेटी के सहयोग से सफल रूप से किया।
रिश्ते ताले की तरह होते हैं, जिन्हें चाबी से खोलते हो, तो हर बार काम आयेंगे और हथौड़े से खोलोगे तो एक बार काम आयेंगे। हथौड़े ने चाबी से पूछा – हम तिजोरी को खोलने में पूरा वजन, शक्ति, दम लगा दिया, तब भी ताला नहीं खुला और तुम छोटी-सी, कैसे खोल दिया। चाबी बोली – तुमने अपनी ताकत, दम का प्रयोग सिर पर चोट करने में किया और मैं हृदय को स्पर्श करती हूं। संवेदनशील स्थान छिद्र में नम्रता दिखाती हूं और खुल जाता है। यह कहते ही आचार्य श्री सुनील सागरजी ने अहमदाबाद यूनिवर्सिटी की धर्मसभा में भाई दूज के अवसर पर वहां आये सैकड़ों भाई-बहनों को संबोधित किया। इस अवसर पर तीर्थक्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष श्री जम्बू प्रसाद जैन जी के साथ चैनल महालक्ष्मी को भी आने का सुअवसर मिला।
भाई-बहन के इस त्यौहार पर आचार्य श्री ने आज बिखरते रिश्तों को संजोने पर जोर देते हुये कहा कि रिश्ते भी तितली की तरह होते हैं। तितली को जोर से पकड़ोगे, तो मर जायेगी, अगर ढीला किया तो उड़ जायेगी। ठीक से पकड़ोगे, तो सदा हाथ में रह पायेगी, बस ऐसे ही रिश्ते हैं। तेरे संग हम रह नहीं सकते, आज हो गया कि तेरे साथ हम नहीं रह सकते, तक पहुंच जाते हैं, जब हम रिश्तों को नहीं समझते। दबाव डालने से नहीं, अपनेपन से फासले कम होते हैं, ध्यान रखना कोर्ट-कचहरी से नहीं आता अपनापन। आज संयुक्त परिवार एकल में बिखर रहे हैं, इसमें जानवरों जैसी प्रकृति दिखाई देती है।
भाई-बहनों के बीच आई दरारें खत्म हो, इसी भावना को हर के भीतर उतारते हुये, उन्होंने कहा कि लोगों की जुबां पर तब तक आपका नाम रहेगा, जब तक तुमसे उनका काम रहेगा। भोग विलास की दौड़ में रिश्तों का नुकसान हो रहा है। प्रयास करिये, संस्कार बने रहे, संयुक्त परिवार में रहे। आज मोबाइल आदमी के हाथ में नहीं रहता, बल्कि मोबाइल आदमी को हाथ में रखता है। जिन पौधों को पानी से नहीं सींचा जाता, वे सूख जाते हैं, जिन रिश्तों को प्रेम से नहीं सींचा जाता, वो भी नष्ट हो जाते हैं। गलतफहमी से बड़ी समस्यायें पैदा होती हैं।
रिश्तों में धोखा मत दीजिए, चाहे विराम दे दीजिए। पत्ते पेड़ पर सुरक्षित रहते हैं, टूटे पत्तों को झाडू से झाड़कर जला दिया जता है। इसी तरह रिश्ते हैं, बड़ों का सम्मान, छोटो के प्रति अपनापन। अकेलापन, आधुनिकता, मोबाइल ही रिश्तों में दरार के कारण नहीं, बल्कि उसको बिगाड़ने का काम उसके सगे मां-बाप भी करते हैं। जैसे दही को जमाने के लिये बार-बार अंगुली नहीं करते, उसी तरह अपनी बेटी के घर में, उसके जीवन में, बार-बार अंगुली नहीं कीजिए।



















