मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी ने कहा –
॰ मैं समर्थवान नहीं, पर गुरुजी के आदेश का पालन
॰ 10-10 निर्यापकाचार्य बनाये, सब सौ-सौ दीक्षायें देंगे
॰ दीक्षाओं की सूचना ज्येष्ठ श्रेष्ठ आचार्य श्री समयसागरजी को
24 नवंबर 2022/ मंगसिर शुक्ल चतुर्थी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

‘थोड़ा ठण्डा खाना ठीक है, मैंने जिंदगी में ठण्डा-ठण्डा ही खाया है, उससे मन भी मस्त, तन भी मस्त, साधना भी मस्त, ज्ञान भी मस्त होता है। धीरे-धीरे ये 14 मोक्ष की ओर बढ़ेंगे। गुणस्थान 14 होते हैं, दीक्षायें भी 14 हैं। मेरी दीक्षा भी तीज को हुई थी, आज भी तीज है। तभी इन सबको ऐलक दीक्षा संस्कार दे रहा हूं। इन सबका उपवास है आज, आप सब एकासन कर सकते हो’ इन शब्दों के साथ मुनि पुंगव श्री सुधा सागरजी ने सिंहासन से उतर दीक्षा संस्कारों की शुरूआत कर दी। दर्शनोदय तीर्थ (थूबोनजी) तीर्थ पर हजारों की बड़ी उपस्थिति में मंगसिर शुक्ल तीज, 23 नवंबर को एक नया इतिहास लिखने की शुरूआत की।

यह एक इतिहास रचा गया थूबोनजी में जब वहां आप हमारे भावी आचार्य, आप साक्षात आचार्य हैं, के नारे लगे। डॉ. सुरेन्द्र भारती ने उन्हें माता-पिता – ज्येष्ठ भ्राता के नाम से भी संबोधित किया।
सूचना ज्येष्ठ श्रेष्ठ आचार्य श्री समयसागरजी को
मुनि पुंगव श्री ने कहा कि गुरुवर के आदेश के बाद मैंने यह कदम उठाया। वर्तमान में हमारे ज्येष्ठ समय सागरजी, हमारे आचार्य, ज्येष्ठ भ्राता हैं। वे आचार्य पद का निर्वाह कर रहे हैं। उनको भी समाचार भेजे थे, कि जो भावना आचार्य श्री ने कही थी, इसीलिए मैं ये दीक्षायें दे रहा हूं और यह सूचना मैंने आचार्य श्री समय सागरजी को भेजी थी। मेरा मन नहीं था, पर गुरुदेव के आदेश से यह हो रहा है।

गुरुजी ने मुझे आशीर्वाद दिया,उनका आदेश मानना होगा
मुनि पुंगव श्री सुधा सागरजी ने कहा कि कुंद कुंद आचार्य के बाद श्रमण संस्कृति को ऊंचाई देने वाले आचार्य श्री थे। उन्हें मैं कई बार बोल चुका था कि मैं अपने को समर्थवान नहीं मानता, पर गुरुजी ने कहा कि गुरु ने योग्यता देख ली है, मैं तुम्हें आदेश देता हूं कि ब्रह्मचारी तैयार करो, फिर उन्हें आगे बढ़ाओ। उनके आदेश के बाद कर रहा हूं। अपनी ज्ञान, कला, शक्ति वसीयत को आगे सौंप देना चाहिए। गुरुवर 20 मिनट तक समझाते रहे। तीन ब्रह्मचारी तैयार किये थे, सेम्पल के रूप में भेजे। आचार्य श्री ने खूब आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि तीनों ब्रह्मचारियों को भेजो, मैं क्षुल्लक बनाकर भेजूंगा।
10-10 निर्यापकाचार्य, हर के 100-100 शिष्य, हजार साल चले
मुनि श्री सुधा सागरजी ने यह भी कहा कि गुरुजी ने 10-10 निर्यापाकाचार्य बनाये, इसीलिये तैयार किये कि वो 100-100 शिष्य तैयार करें और उनका पौधा 1000 साल तक चले। उनकी बड़ी सोच थी। अन्तिम बार में उन्होंने कहा था कि मैंने 10 निर्यापकों को संघ सौंप दिया है। मेरी इस कार्य को करने की रुचि नहीं थी, पर गुरु की बात भावना को रखना मेरा कर्तव्य है।
इस अवसर पर सुशीला पाटनी ने कहा कि आचार्य श्री के सान्निध्य में दो बार – नेमावर-रामटेक की दीक्षायें देखीं। ये सब दीक्षार्थी आने वाले समय में आचार्य श्री और सुधा सागरजी का नाम ऊंचा करें, ऐसी भावना भाई।

दीक्षार्थी एलक महाराज जी का नामकरण:-
निर्यापक श्रमण मुनिश्री सुधासागर जी महामुनिराज जी के करकमलों से प्रदान की गई एलक दीक्षा उपरांत दीक्षार्थियों का नामकरण इस प्रकार किया गया:-
1. एलक श्री वरिष्ठ सागर जी महाराज 2. एलक श्री विदेह सागर जी महाराज 3. एलक श्री सुज्ञान सागर जी महाराज 4. एलक श्री सुयोग सागर जी महाराज 5. एलक श्री सुमेध सागर जी महाराज 6. एलक श्री सुबोध सागर जी महाराज 7. एलक श्री सुनय सागर जी महाराज 8. एलक श्री सुधर्म सागर जी महाराज 9. एलक श्री सुयश सागर जी महाराज 10. एलक श्री सुदय सागर जी महाराज 11. एलक श्री सुगुण सागर जी महाराज 12. एलक श्री सुविवेक सागर जी महाराज 13. एलक श्री सुशांत सागर जी महाराज 14. एलक श्री सुचेतन सागर जी महाराज।
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जैसे गणधराचार्य श्री विराग सागरजी ने सभी शिष्यों के नाम ‘वि’ से रखें, इसी तरह मुनि श्री सुधा सागरजी ने सभी 14 के नाम ‘सु’ से रखें, अपने नाम के पहले अक्षर से।
















