16 जुलाई 2025 / श्रावण कृष्ण षष्ठी/चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
वर्षा योग स्थापना के लिए सूर्य नगर में प्रवेश से पहले, आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज की सुशिष्या और आचार्य श्री समय सागर जी की आज्ञानुवर्ती कंठ कोकिला से अमृत रसपान कराती आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी ने वीर शासन जयंती के अवसर पर ऋषभ विहार में जन-जन में जागृति फैलाने हेतु धर्म सभा में कहा कि अरिहंतों की दिव्य ध्वनि जब गणधरों ने गूंथी और उसे महामुनि राजो द्वारा रचा गया, वही जिनवाणी आज चार अनुयोगों में हम सबको मिल रही है। आज जिनका, तीनों लोकों में शासन है, वह महावीर स्वामी का जिनशासन है। यह जो आप राजनीतिक शासन देखते हैं, यह तो आज है, कल चले जाएंगे। यहां ऊंच-नीच सब कुछ होता रहता ह । पर उनके जिन शासन में जो शाश्वत रहता है, किसी से पराभूत नहीं होता, भेदभाव नहीं, भेद ज्ञान कराता है।

उस जिन शासन में सभी जीव सुखी रहते हैं, किसी का किसी के ऊपर बस नहीं चलता, वास्तव में शासन उसी का नाम है वीर शासन, यानी जिन शासन का एक रूप जहां सजा नहीं होती, अधिकार की बात नहीं होती, सब स्वाधीन है। ना कुछ मिटता है, ना कोई मिटाता है ।
समाज में स्वाध्याय के प्रति कम हो रही आंतरिक भावना और मंदिरों में बढ़ते शास्त्रों के भंडार पर उन्होंने जोर देकर कहा कि आज मंदिरों में ग्रंथों की भरमार है, छपाते रहो और इकट्ठा करते रहो, पर स्वाध्याय नहीं करते।
श्रुत पंचमी पर उनकी सफाई होती है और दिवाली पर उनकी पोटली बनाकर छंटाई होती है यानी सफाई के नाम पर वह जिनालय से हटा दिए जाते हैं, पर आप लोग स्वाध्याय नहीं करते। पूरे समय उन पर धूल चढ़ी रहती है। मंदिरों में एक फैशन बन गया है नई-नई अलमारी लगाने का और उनमें जैसे नए-नए शास्त्र भरकर रखने का। उन्हें रखना नहीं है, पढ़ना है। महावीर स्वामी की जिनवाणी को जन-जन में प्रचार करना है, प्रभावना करनी है। सारे देश को ही नहीं, पूरी दुनिया को बताना है, उनकी वाणी के बारे में। गिन-गिन कर आज धर्म करते हो, इस पर उन्होंने कहा कि एक भक्त ने यह कहकर तोड़ दी माला कि गिन गिन कर क्यों करूं, जब देने वाला बेहिसाब देता है। उन्होंने कहा कि वीर शासन के मूल रूप में जिन शासन है। वैसे वीर शासन की शुरूआत श्रावण कृष्ण एकम को ही हुई । वहीं जिन शासन जो अनादि है ।
उन्होंने कहा कि ध्यान रखना कि आज तुम नाम, प्रसिद्धि के पीछे भागते हो, पर जितना भागोगे, उतना ही पुण्य क्षीण होता जाएगा। आज चर्या तो चतुर्थ काल की करते हैं, पर भावों की विशुद्धि छठे काल की होती है। ऐसे मद की चाहत मत करो, जो परेशान करे। कुछ लड़ाई झगड़ा नहीं, बाहरी घर से निज घर में रहने का प्रयास करो। साधर्मियों से प्रेम करो, जो करता है वही सिद्ध आराधना करते, वहां पहुंच सकता है। कषायों को मिटाओ, गांठे खोलो और आप भी चातुर्मास करो। जिनवाणी में लीन रहो। इसीलिए माताजी ने वर्षायोग के दौरान पुरुषों के लिए एक विशेष क्लास सुबह रखी है, वहीं महिलाओं के लिए दोपहर में।














