13 दिसंबर 2025 / पौष कृष्ण नवमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
एकादशी साल में चार बार अनोखे रूप में आती है, यानि 3 या चार कल्याणक। अभी गये मार्गशीर्ष शुक्ल की एकादशी को तीर्थंकर मल्लिनाथ जी के जन्म-तप और नमिनाथ जी का ज्ञान कल्याणक। फिर फाल्गुन कृष्ण को तीर्थंकर ऋषभनाथ जी का ज्ञान और श्रेयांसनाथ जी का जन्म-तप कल्याणक आयेगा, वही चैत्र शुक्ल एकादशी को तीर्थंकर सुमतिनाथ जी के जन्म-ज्ञान व मोक्ष कल्याणक।

इन तीन से भी खास है इस सोमवार 15 दिसम्बर को आ रही पौष कृष्ण की एकादशी जब 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ और 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ जी का जन्म तप कल्याणक। साल में यही एक दिन होता है जब चार कल्याणक आते हैं।

वैसे तो सभी तीर्थंकरों के गुण एक समान होते हैं, पर व्यवहारिक रूप में कुछ अंतर भी दिखाई देते हैं, जैसे –
1. चन्द्रप्रभ श्वेत रंग के, तो पार्श्वनाथ श्याम रंग के।
2. जहां चन्द्रप्रभ की आयु 10 लाख वर्ष पूर्व और एक पूर्व होता है 84 लाख पूर्वांग और एक पूर्वांग 84 लाख वर्ष का यानि आयु 10 लाख Ÿ 84 लाख Ÿ 84 लाख, इतनी कि आपका केलकुलेटर भी जवाब दे दे। वहीं पारस प्रभु की आयु सिर्फ 100 वर्ष।
3. तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का कद 150 धनुष या कहें 900 फुट का था, वहीं पारस प्रभु की ऊंचाई 9 हाथ यानि साढ़े तेरह फीट की।
4. जहां चंद्रप्रभ ने साढ़े 6 लाख वर्ष पूर्व 24 पूर्वांग तक राजपाट किया वहीं पारसप्रभु ने नहीं संभाला अपने पिता विश्वसेन का राज।
5. तीर्थंकर चन्द्रप्रभ ने विवाह किया, वहीं पारस प्रभु बाल ब्रह्मचारी रहे।
6. चन्द्रप्रभ को अध्रुवादि भावनाओं का चिंतवन करने से वैराग्य हुआ, वहीं पारस प्रभु को जाति स्मरण से।
7. जहां चन्द्रप्रभ के साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ली, वहीं पारस प्रभु के साथ 300 ने।
8. चन्द्रप्रभ के तीन माह के तप के बाद केवलज्ञान की प्राप्ति हुई, वहीं पारस प्रभु को चार माह के तप के बाद।
9. चन्द्रप्रभ का समोशरण साढ़े 8 योजन विस्तृत था, वहीं पारस प्रभु का सवा योजन का। एक योजन 12 किमी विस्तृत होता है।
10. जहां चन्द्रप्रभ के समोशरण में 93 गणधर थे, वहीं पारस प्रभु के 10 गणधर थे।
11. दोनों ही तीर्थंकर श्री सम्मेदशिखरजी से मोक्ष गये, पर चन्द्रप्रभ बिल्कुल पूर्व की ललित कूट से, वहीं पारस प्रभु पश्चिम में स्वर्ण भद्रकूट से। वैसे इन दोनों कूट के लिये अब सबसे चौढ़ी सीढ़ियां हैं। केवल पारस प्रभु की स्वर्णभद्र कूट पर दो जगह चरण है।
12. तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का तीर्थ काल 90 करोड़ सागर चार पूर्वांग का रहा, इतना लम्बा, वहीं पारस प्रभु का तीर्थकाल सबसे कम 278 वर्ष का रहा।
ऐसा पावन दिन है पौष कृष्ण एकादशी, 23वें तीर्थंकर का 2703वां जन्म कल्याणक है। सान्ध्य महालक्ष्मी परिवार की ओर से ऐसे पावन दिवस की सभी को हार्दिक मंगल शुभकामनायें।

जन्म-तप एक दिन की प्रतीक, पारस-चन्द्रप्रभ की एक अनोखी प्रतिमा
चौंकिए मत, आज सान्ध्य महालक्ष्मी भारत की एक अनोखी प्रतिमा के बारे में बता रहा है जो उत्तर प्रदेश के खतौली के श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। इस प्रतिमा में जहां प्रतिमा पर नौ फणी सर्प हैं, पर इस पदमासन श्वेत प्रतिमा में नीचे चिह्न चन्द्रमा का है। यानि ऊपर से पारस प्रभु को दर्शाती, पर चिह्न से चंदा प्रभु की, यह है न अनोखी प्रतिमा। जैसे वो कहती है, दोनों तीर्थंकरों का जन्म-तप एक ही तिथि पौष कृष्ण एकादशी को हुआ।
जन्म एक दिन, पर गर्भ कल्याणक में माह का फर्क क्यों?

शास्त्रानुसार हर तीर्थंकर बालक गर्भ में नौ माह रहता है। पर चन्द्रप्रभ व पारस प्रभु के गर्भकल्याणक में एक माह का फर्क क्यों? चन्द्रप्रभ चैत्र कृष्ण पंचमी को महारानी लक्ष्मणा जी के गर्भ में आये, वहीं वामादेवी के गर्भ में पारस प्रभु बैसाख कृष्ण द्वितीया को आये,यानि 8 माह ही गर्भ में रहे। इस जिज्ञासा का एक ही समाधान सान्ध्य महालक्ष्मी की नजर में आता है कि जब पारस प्रभु गर्भ में रहे तब अधिक मास वाला वर्ष रहा होगा, तभी मास गणना 9 की जगह 8 माह की रह गई।

एक जिनालय में दो मूल वेदी, वो भी चन्द्रप्रभ-पारसप्रभु की, कहां?
एक और अनोखी बात बता रहे हैं, सान्ध्य महालक्ष्मी, जी हां, भारत की राजधानी दिल्ली में 400 वर्ष प्राचीन अनोखा तीर्थ है, जहां दो मूल वेदी है, जी हां, चन्द्रप्रभु व पारस प्रभु की। जी हां, यह तीर्थ है चांदनी चौक का लाल मंदिर। दोनों वेदियों के चित्र आप यहां देख सकते हैं।



















