॰ जैनेत्तर मूर्तियां वहीं वापस, अध्यक्ष पर लगा दाग
॰ जहां अच्छा काम किया, वहीं बदनाम किया
26 नवंबर 2022/ मंगसिर शुक्ल षष्ठी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन
तीर्थंकर आदिनाथ का चमत्कारी अतिशय तीर्थ, जिसके अध्यक्ष हुकुम चंद काका ने दिल बड़ा करते हुए, दूसरे धर्म की कुछ प्रतिमाओं का अपने तीर्थ पर पूजा-पाठ आदि न होता देखकर,जैनत्व कर्तव्य निभाते हुए उन जैनेत्तर प्रतिमाओं को अलग से विराजमान कराने के लिए 25 Ÿ 50 फुट की जगह और उस मंदिर का निर्माण कराने के लिए 21 लाख रुपये देकर अच्छा मुहूर्त निकालकर, दोनों धर्मों के लगभग सभी की अनुमति लेकर, एक प्रस्ताव बनाकर, बाकायदा उसे नोटोराइज कराकर, जो दोनों सनातन परम्पराओं में भाई-भाई की बात को प्रगाढ़ता देते हुये अच्छा कदम उठाया, उसको राजनीतिक आकांक्षाओं की न केवल भेंट चढ़ाया गया, बल्कि मानो प्रत्युत्तर मिला – ‘हम आपके हैं कौन’। यही नहीं, अच्छे काम को अनदेखा कर, प्रशासन भी चार कदम, आंख बंद करके आगे आया और नेकी करने वाले को ही सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। वाह रे धर्मनिरपेक्ष भारत! सचमुच भरत चक्रवर्ती के नाम पर पड़े हमारे देश के नाम भारत, पर कलंक लगाने में भी देर नहीं लगाई।

क्या संकेत मिलता है इससे, चारों खाने चित्त पड़े जैन समाज ने कभी सोचा? जब भाई-भाई के बीच बात आयेगी, तो जैन समाज को वही समझा जायेगा, जैसे बाहर वालों को समझा जाता है। वही सलूक होगा मानो दूध में मक्खी आ गई। ऊपर नाम से भाई-भाई, पीछे-पीछे तलवार चलाई। बिना थोड़ी भी जांच के कैसे प्राथमिकी दर्ज कर कार्यवाही होती है, वह झालावाड़ थाने में देख सकते हैं, और कैसे जैन आयतनों पर हो रहे हमलों पर आंखें बंद रखी जाती हैं, वो देशभर में देख सकते हैं।

अध्यक्ष हुकुम चंद का क्या कसूर था, यही कि उन्होंने दूसरे सनातन भाई की प्रतिमाओं का पूर्ण सम्मान अपने जिनालय में न हो पाने के कारण, उन भाइयों को जगह और पैसा दिया, बदले में क्या मिला, ‘चोर’ की उपाधि और जेल की सलाखों के पीछे विश्राम।
सूत्रों से जानकारी मिली है कि खानपुर कस्बे (चांदखेड़ी) में उपचुनाव होना था, ऐसे में राजनीतिक दलदल में गुटबाजी होना, हमारे देश की तो आज परम्परा बन गई है। धर्म और जाति के नाम पर हर जगह भाई-भाई को लड़वाने में कोई पीछे नहीं रहता और यहां भी अराजकतत्वों ने खूब हंगामा किया, भले ही गिनती में बहुत कम थे, पर जैनों के खिलाफ आवाज खोलने के लिये पर्याप्त थे। जैनों की आज उन्हीं के चक्रवर्ती राजा के राज में क्या औकात को आईना दिखा दिया, चाहे अदालत से अध्यक्ष को जमानत मिल गई हो।

हां, जैन संख्याबल में ही कमजोर नहीं, जज्बा भी खोखला है। अहिंसक नकाब के पीछे का कायरता का चोगा साफ दिख रहा है। जैन कहीं मुंह उठायें, तो सब रिश्ते तार-तार कर देना, यहां ही नहीं, गिरनार, केसरियाजी, नयापुरा (उज्जैन) कहां नहीं देखा गया, आजादी के बाद विशेषकर पिछले 5-10 बरस में। कब्जे की इबारत 12 सदी पहले ही नहीं, आज भी वैसे ही जस की तस है। हम सावधान नहीं हुये, न ही सजग, क्योंकि अपनी संस्कृति-वसीयत को बचाने का समय हमारे किसी श्रेष्ठियों के पास नहीं। कुछ राजनीतिक दबाव में दबे हैं, तो तुछ अपने नोटों की मशीन चलाने में।

क्या सीखना होगा?
एक रहना होगा। घर में बर्तन खड़कते रहे, पर बाहर आते ही शतरंजी बिसात बिछाने पर वजीर-राजा को नहीं, हर घोड़े हाथी, ऊंट के साथ पैदल को भी मजबूती से जमे रहना होगा। भय का अघोषित वातावरण बनाया जा चुका है। हर फुंसी को कैंसर बनने से पहले इलाज करना अति आवश्यक हो गया है। ऐसे डॉक्टरों की सेना की आज बड़ी आवश्यकता है। कहने को हमारे पास कई शेर और सेना है, पर आज नाम में नहीं, करनी में जरूरत है।
कागजात पूरे रखें, यही सुरक्षा के हथियार हैं
हर बड़े तीर्थ से लेकर छोटे जिनालय तक, सभी के दस्तावेज पूरे रखिये, नहीं तो कहां से कौन-सा ब्लास्ट हो जाये, कहा नहीं जा सकता। ऐसा भी देखा जाता है, जब एक कमेटी बदलती है, तो पुरानी जाने वाली को फूटी आंख नहीं सुहाती, दो फाड़ हो जाते हैं, उन्हें कागजात आदि भी नहीं सौंपे जाते। ऐसा बड़ी-बड़ी संस्थाओं में चैनल महालक्ष्मी ने स्वयं अनुभव किया है। और यही कारण है, युद्ध के मैदान में बगैर हथियारों के खड़े सैनिक का शिकार आसानी से हो जाता है।
समय की क्या मांग?
वैसे तो आज हमारे समाज में गांधी बनने वाले बहुत हैं, पर आज बोस, भगत, राजगुरु के साथ झांसी की रानी जैसे ही नहीं अबक्का की रानी जैसों की भी जरूरत है। एक होने की जरूरत है, मूंछ को मरोड़ने वालों की नहीं, जिनकी बाजुओं में फड़कती हो अन्याय के खिलाफ, संस्कृति की सुरक्षा के लिए।
चैनल महालक्ष्मी का यह निवेदन, अपील है, प्रार्थना है, उन सभी के लिये जिसे सरकार ने 44,51,753 की गिनती में निपटा दिया है। जागते रहो और एक रहो।
















