अदालत ने लगाई बाल दीक्षा पर रोक ॰ वक्त आ गया कि दीक्षा की न्यूनतम उम्र सीमा तय हो

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॰ पहले शिक्षा फिर दीक्षा या फिर दीक्षा के बाद शिक्षा
01 जनवरी 2026 / पौष शुक्ल त्रयोदशी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

महाराष्ट्र के मुम्बई बोरीवली में पहली बार 59 मुमुक्षु एक साथ दीक्षा दी जा रही है 04 से 08 फरवरी 2026 को, जिनमें 18 पुरुष, 41 महिलायें हैं। सबसे वरिष्ठ मुमुक्षु 71 वर्षीय और सबसे छोटी 7 साल की बिटिया। पर अब सूरत की फेमिली कोर्ट ने उस बच्ची की दीक्षा पर रोक लगा दी है। 7 महीने पहले भी इसी तरह का एक और मामला सामने आया था, जिसमें एक दम्पत्ति के बीच 12 वर्षीय लड़के की दीक्षा को लेकर हुए विवाद के चलते मामला अदालत में पहुंच गया था।

इस मामले में शादी 2012 में हुई थी, उनके दो बच्चे हैं, पर अब बेटी की दीक्षा के विवाद के चलते गत वर्ष से दोनों अलग रह रहे हैं।
अपनी बेटी के दीक्षा संस्कार को रोकने के लिए फेमिली कोर्ट का रूख करने वाले पिता ने अपने बयान में कहा, ‘मुझे इस बारे में तब पता चला जब मेरे परिचिंतों ने मुझे बताया कि आपकी बेटी दीक्षा संस्कार लेने जा रही है।’

उनका कहना है कि मैंने परिवार की सहमति से मामला दर्ज कराया। हमने पहले अपनी पत्नी से इस बारे में बात की थी कि बेटी अगर बड़ी होकर दीक्षा लेती है तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन वह अभी छोटी है। पर मां उसकी छोटी उम्र में ही दीक्षा लेने के लिये अड़ी रही और बहस के बाद वो पति का घर छोड़कर चली गई बेटी के साथ।

पिता ने आरोप लगाया कि पत्नी ने उससे कहा था कि जब तक तुम दीक्षा संस्कार के लिए तैयार नहीं हो जाते, मैं घर नहीं आऊंगी। इसी कारण पिता ने फेमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और 10 दिसम्बर को कहा कि उनकी अलग रह रही पत्नी ने उनकी मर्जी के खिलाफ मासूम बच्ची को दीक्षा दिलवाकर साध्वी बनाने का फैसला लिया है। गार्जिएंस एंड वार्डस एक्ट 1890 के तहत पिता ने बच्ची के हितों की रक्षा के लिए उसको कानूनी अभिभावक बनाने की मांग की है। फेमिली कोर्ट की जज मंसूरी ने पति की याचिका पर पत्नी को नोटिस जारी किया और पत्नी को 22 दिसम्बर तक जवाब देने के लिए कहा।

अदालत का मुख्य ध्यान बच्ची के कल्याण और अधिकारों पर रहा, क्योंकि इतनी कम उम्र में लड़की स्वयं संयम का मार्ग चुनने का निर्णय नहीं ले सकती। 08 फरवरी 2026 को आचार्य सौमसुंदर सूरीश्वर जी सहित कई महाराज साहबों की उपस्थिति में दीक्षा कार्यक्रम आयोजित होना है। 22 दिसम्बर को अदालत ने महत्वपूर्ण निर्णय दे दिया। याचिकाकर्ता के वकील मेहता ने फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि फेमिली कोर्ट ने मां से हलफनामा भी मांगा है, इसमें मां को लिखित देना होगा कि वह बच्ची को दीक्षा समारोह में हिस्सा नहीं लेने देगी। अब अगली सुनवाई 02 जनवरी 2026 को होगी।
इसकी पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3577 व 3569 में देखी जा सकती है।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन : अब समय आ गया है कि दीक्षा के लिए उम्र की न्यूनतम सीमा तय हो, पर यह निर्णय किसी अदालत को नहीं, जैन समाज के चतुर्विध संघ द्वारा लिया जाये, जो सभी को मान्य हो। साथ ही ये भी निर्णय लिया जाये कि दीक्षा से पहले शिक्षा हो या फिर शिक्षा से पहले दीक्षा हो यानि परिपक्वता व बेसिक ज्ञान के बाद दीक्षा हो। आज जिस तरह के मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में यह आवश्यक हो गया है।