12 मार्च क्यों है सभी के लिए खास- भारत की पहचान के लिए, अयोध्या के निर्माण के लिए, साधु -संतों के लिए, रोजगार के लिए, बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ के लिए, तीर्थों की सुरक्षा के लिए

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चैत्र कृष्ण नवमी : इस कल्याणक को मनाना, कभी भूल ना जाना, तीर्थंकर श्री ऋषभनाथ, भरत चक्रवर्ती, ब्राह्मी की जन्मतिथि

॰ महज याद रखना नहीं, धूमधाम से मनाना और प्रचारित करना होगा, वर्ना बहुत कुछ खो देगा जैन समाज
॰ अगर अभी भी नहीं जागे, तो सिमट जाएगा जैनों का इतिहास 2600 सालों में, शुरूआत हो गई है
॰ हर मंदिर में, अपने घरों में दीपक जलायें
॰ इस बार शुरूआत करें, अगली बार दोगुने उत्साह से यह क्रम आगे बढ़ायें, वक्त की यही मांग है।

8 मार्च 2026 / चैत्र कृष्ण पंचमी /चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन

नहीं, नहीं, धर्मतीर्थ की शुरूआत नहीं की थी, प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभनाथ जी ने धर्मतीर्थ का प्रवर्तन किया। चैत्र कृष्ण नवमी, धर्म प्रधान देश के लिये बहुत खास है, जो इस बार 12 मार्च को है। महावीर जन्म कल्याणक मनाने वालों, अगर मनाना है तो पहले इस दिन को मनाना, तभी उस संस्कृति की पहचान बरकरार रख पाओगे, वर्ना जी20 में सरकार ने जैन इतिहास को मात्र 2650 वर्ष में निचोड़ कर रख दिया है। जिंदा रखना है अपने वजूद को, अपनी पहचान को, अपने धर्म को, अपनी संस्कृति को जान लेना। कुछ दीपक घर की मुंडेर पर, मंदिर की चौखट पर, बांट देना कुछ लाडू अजैन भाईयों में, चंद शब्द जरूर लिखना अपने सोशल हेंडल पर, सिर्फ फारवर्ड नहीं करने का, कुछ नया लिखने का। जब लकीर मिटाने की कोशिशें हो रही हों, तो पहचान बनानी ही होगी, आज वही कुछ बातें सान्ध्य महालक्ष्मी बता रहा है, जो आप अपने भीतर उतारने के प्रयास तो कर सकते हैं –

चैत्र कृष्ण नवमी दिन है बहुत खास
हां, यह दिन है जन्म-तप कल्याणक का प्रथम तीर्थंकर प्रजापति का, आदिनाथ जी का, यह दिन है पहले भगवान के जन्म का, असि-मसि-कृषि – विद्या – वाणिज्य – शिल्प – आदि कर्म करने की शुरूआत, यह दिन है प्रथम चक्रवर्ती के जन्म का, हां, उन्हीं का, जिनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा, हां, यही दिन है प्रथम आर्यिका के जन्म का, जी हां, चौथे काल से पहले ही तीसरे काल में जन्म लेकर सबसे पहले तीर्थंकर, उन्हीं में ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती और प्रथम आर्यिका बनने वाली पुत्री ब्राह्मी जी का – एक नहीं तीन का जन्म इस दिन चैत्र कृष्ण नवमी को।

संदेश बांट देना- देन अयोध्या की
आज दुनिया अयोध्या को श्रीराम जी के रूप में पहचानती है, पर क्या अयोध्या की पहचान श्रीराम से हुई। यह प्राचीन संस्कृति का बदलाव है। हकीकत में अयोध्या का निर्माण देवों द्वारा हुआ था, जब मरुदेवी के गर्भ में ऋषभनाथ जी आये थे। वह अयोध्या आज किस नाम से जुड़ गई। मिटाया जा रहा है शाश्वत भूमि को। उस पहचान को, जीवंत करने की कोशिश तो करनी होगी, तभी अपनी संस्कृति को बचा पाओगे। यह जन्म कल्याणक मनाना ही उसकी प्रथम सीढ़ी है।

श्रमण संतों की चर्या
हां, श्रमण परम्परा की शुरूआत उन्होंने की, पर हकीकत में संत स्वरूप की शुरूआत उन्होंने की। कैसी होनी चाहिये चर्या। आहार से पहले 6 माह तप साधना और फिर आहार लेने-देने की प्रक्रिया में गांव-शहर घूमते रहे यानि 389 दिन बाद हुई आहार चर्या। उनके द्वारा शुरू की गई वो परम्परा आज तक चली आ रही है। किसी भी धर्म में, संस्कृति में आज यह प्राचीनतम परम्परा है, पर कौन जानता है?

सभी धर्मों में वंदनीय
श्रमण धर्म के प्रवर्तन तो हम सब कहते हैं, पर हकीकत में धर्म की ऐसी कोई विधा नहीं, जिसमें ऋषभनाथ जी को वंदनीय नहीं माना हो।
हिंदू, सिख, मुस्लिम, यहां तक कि ईसाई धर्म में, इजरायल जैसे देश तक के ग्रंथों में उनकी अलग पहचान है, तब भी जैन इतिहास को महज 2600 साल में सिमेटना किस सोच का परिचायक है?

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
आज सरकार यही स्लोगन प्रचारित करती है, पर बेटी को शिक्षित करने की शुरूआत, करने का इतिहास कही नहीं बताया जाता। अगर यह शुरूआत किसी और धर्म में होती, तो शायद पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जा रहा होता। पर अपनी दोनों बेटियों ब्राह्मी और सुंदरी को वर्ण और अंक की शिक्षा देने की शुरूआत ऋषभदेव ने ही की। यह पहचान दुनिया में जीवंत करनी है।

चक्रवर्ती और देश का नाम
चैत्र कृष्ण नवमी को ऋषभदेव जी का ही जन्म नहीं हुआ, उन्हीं के ज्येष्ठ पुत्र भरत का भी हुआ था। यह हम कम जानते हैं। पहले चक्रवर्ती थे। छ: खण्ड के राजा थे। वैसे उनसे पहले इतने चक्रवर्ती हो चुके थे कि विपुलाचल पर्वत पर अपना नाम तक लिखने की जगह नहीं थी, अपना नाम लिखने के लिये उन्हें एक नाम मिटाना पड़ा। यही नहीं, उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा। पर सरकार शकुंतला – दुष्यंत पुत्र भरत को प्रचारित करने में लगी है। जैन संस्कृति को छोटा करने की कोशिशें हर तरफ हो रही हैं।

अगर अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखना है, तो ऋषभनाथ जी के जन्म कल्याणक को राजपत्रित अवकाश घोषित करायें, इसके लिये राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम छेड़ी जाये। उनकी यह पहल स्वागत योग्य है, पर 20 दिनों में दो अवकाश एक अल्पसंख्यक समाज को दे दे सरकार, बहुत मुश्किल है।

बेहतर होगा कि प्रथम तीर्थंकर के मोक्ष कल्याणक दिवस माघ कृष्ण चतुर्दशी को सार्वजनिक अवकास के रूप में ही घोषित करवाने के प्रयास किये जायें।
कई कारण हैं इस चैत्र कृष्ण नवमी को पूरे जोर-शोर, धूमधाम से मनाने के, अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिये, यह नितांत जरूरी है।

राजस्थान मदरसा बोर्ड की अभिनव पहल का धन्यवाद
तीर्थंकर दिवस ऋषभ नवमी 12 मार्च के अवसर पर शिक्षा विभाग की ओर से मदरसों,छात्रावासों, आवासीय विद्यालय,अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में आयु समूह के आधार पर विभिन्न प्रतियोगिता का आयोजन करवाना मदरसा बोर्ड की अभिनव पहल है l

इस बारे में पूरी जानकारी चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3651 में देखी जा सकती है।