देर से सही, पर मुनि पुंगव सुधा सागर जी ने की आवश्यक पहल
पूरे आचार्य श्री संघ ने किया विरोध
खास भक्त बन जाते नायक से खलनायक
पुतले बनाना-जलाना, कालिख पोतना आने वाले भविष्य के लिये खतरा
26 अगस्त 2025 / भाद्रपद शुक्ल तृतीया /चैनल महालक्ष्मीऔर सांध्य महालक्ष्मी/ शरद जैन /
स्वतंत्रता दिवस के अगले दिन, भावी तीर्थंकर के जन्म दिवस यानि जन्माष्टमी का दिन, जिज्ञासा समाधान के मंच पर जो 75 वर्षीय खास भक्त ने अपने गुरु के गुणगान में पूर्व की लिखी पंक्तियों को पढ़ते हुए उन्होंने जो बोला, उसने पूरे जैन समाज में रोष पैदा कर दिया।
‘गुरुजी दस दिनों से नींद नहीं आ रही, चिंता और चिंतन, चिंता बहुत बड़ी है, हमारी लाइफ में तीन हमारे गुरु हैं। पहले गुरु प्रमाण सागर 30 साल हो गये, जो पहली क्लास में हैं और पहली क्लास से भी आगे नहीं बढ़ पाये, दूसरे गुरु हमारे विशुद्ध सागर, जो एलकेजी से शुरु हुए, पीएचडी कर ली, महाराजा बन गये, तीसरे गुरु हमारे सुधा सागर तीन साल हो गये, तीन साल से धक्के ही खा रहे हैं – दे धक्का दे धक्का, गुरु के धक्का, फिर गुरु भाई के धक्का, फिर एक दिन सुनी की समाज कुछ नहीं कर सकती, जहां भी सुनो हनुमान जी अपनी ताकत भूल गये थे, तो जामवंत ने याद कराई थी, थोड़ी देर के लिये हम जामवंत बने जा रहे हैं। (खूब तालियां) शांतिसागर महाराज को, दादा गुरु ज्ञान सागर महाराज को आचार्य पद से अलंकृत किया था और हमारी समाज की प्रार्थना है कि आप हमारी विनती को स्वीकार करें और हमारे मुख से हर वाक्य में आचार्य निकल आता है…. हमारी अब छोटी उमर रह गई है…. बस दो तीन साल….और हम आचार्य पद देखना चाहते हैं…..और समय सागर जी से कहूंगा……।
संतोष पटना की उस मंच की इस बात पर जहां वहां मौजूद लोगों ने खूब हंसी-ठिठोली की, जो पूरे देश को, आचार्य श्री संघ के शिष्यों सहित बहुत नागुजार लगी। अपने पिता का कोई बेटा-बेटी अपमान नहीं सहन कर सकता, चाहे वो गृहस्थ में हो या श्रमण में। बस एक-एक करके 20 मुनिराजों और आर्यिकाओं ने, जिन्होंने पत्रकांड जैसे गंभीर विषय पर भी मुंह बंद रखा, पर इस बार नहीं रूके। एक भूचाल सा आ गया। लगभग एक ही समय में दो जैन के पुतले लहराये गये, कालिख पोती गई फूंके गये। एक तरफ संतोष पटना और दूसरी तरफ ब्र. रेखा दीदी व संजीव भैयाजी।
संतों के बढ़ते रोष के साथ मुनि पुंगव श्री सुधा सागर जी ने 19 मिनट के अपने संबोधन में संतोष पटना को उसी मंच से माफी मांगने को कहा और दे भी दी गई, उस सम्बोधन में चार बड़ी बात हुई, मुनि श्री के मुख से-
पहली- संतोष पटना उसी मंच (जिज्ञासा समाधान) से क्षमा मांगे।
‘ गुरु के संबंध में अगर थोड़ा भी अपना मन बिगड़ा है, तुरंत उसका पश्चाताप, प्रायश्चित और अपनी क्षमा याचना का भाव कर लोगे मुझे विश्वास है, आप जल्दी-जल्दी अपनी अनुकूलता से आकर जिस मंच से आपसे यह चूक हुई, उसी मंच से आकर सुधारना चाहिये, यह व्यक्तिगत मेरा भाव है।’

दूसरी- सुनने में चूक हो गई, वर्ना तभी रोक देता
‘मेरा पंडाल की तरफ मुंह था, मैं अगुंली दिखा रहा था, देखा मैंने, मैं उस हरकत को देख इशारा कर रहा था, रोको उसे। इधर वो सारी चर्चा चलती रही, लेकिन अगर वो शब्द हमारे कान में चला जाता, उपयोग में आ जाता, तो मैं उसी समय रोक देता, मेरे गुरु पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला वो तो सूरज हैं, उन पर जितना भी फेकों, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ये शब्द भी मैंने नहीं सुने थे, पर मेरे लिये जो कहना हो कह लो, धक्का कह लो, धक्का खाके गिर पड़े, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, पर मेरे गुरु के बारे में मत कहो।’

3. आचार्य श्री समय सागर संघ के नायक, आचार्य थे, हैं, और रहेंगे
‘हमारे महाराज हैं हमारे संघ के आचार्य समय सागर हैं, तो हैं वो। आप लोग हमारे संघ की अंतरंग व्यवस्थाओं में क्यों पड़ रहे हो। आप गृहस्थ हैं, हम आपकी घर-गृहस्थी में तो नहीं पड़ते। हमारा संघ है, हम अपने संघ के हिसाब से, वो हमारे आचार्य हैं, आज भी हैं, कल भी थे, और कल भी रहेंगे।’
4. जिज्ञासा समाधान में अब कोई विवादास्पद, व्यंग्यात्मक वाली नहीं होगी बात
‘आप लोगों से मैं शिक्षा ले लेता हूं, अब आज के बाद कोई भी जिज्ञासा यहां विवादास्पद नहीं, बस स्वाध्याय की, राष्ट्र सुधार की, समाज के सुधार की, आगम की करो, पर कषायत्मक, व्यंग्यात्मक नाम लेकर नहीं, तुम नाम लेकर करने लगे जिज्ञासा, यह जिज्ञासा का कोई तरीका नहीं। नाम लेकर जिज्ञासा, तुम्हारा इतना साहस, साहस लेकर नहीं आलोचनात्मक नहीं। कई दिनों से देख रहा था कि लोग जिज्ञासा समाधान के मंच को अखाड़ा बना रहे थे। अब जो हुआ, वो हो गया, अब आगे के लिए, अब किसी को भी इस तरह की नहीं।’
जहां इसका पटाक्षेप तो हुआ, सब संतों की आवाज पर हो गया।
जिज्ञासा समाधान मंच, जिसने अनेक संतों के द्वारा शंका सवाल जिज्ञासाओं के दरवाजे खोले, वह मंच वास्तव में थोड़ा तो दिशा से मानो भटक ही गया था, उसे अब वापस सही दिशा में लाने के लिये यह सही कदम था। पर वहीं ब्र. रेखा दीदी व संजीव भैय्याजी के पुतले पर प्रदर्शन, किसी भी रुप में सही नहीं कहा जा सकता।

त्यागियों-भक्तों के पुतले-दिशाहीन हो रहे, पर चुप्पी क्यों?
चैनल महालक्ष्मी को आज उस गीत की याद आ रही हैं – ‘हंस चुनेगा दाना तुनका-कौआ मोती खाएगा..।’ ‘आटे का मुर्गा’ की कहानी भी हर जैन ने पढ़ी होगी। ऐसा अहिंसक जैन समाज सात प्रतिमाधारी ब्र. रेखा दीदी व संजीव भैय्या जी के पुतले बनाकर, चाहे गिनती में कम हो, सार्वजनिक सड़कों पर चले, कालिख पोती, पुतले फूंके, यह क्या हो रहा है, जैन समाज को। आज त्यागी व्रती के पुतले फूंकने का दु:साहस, कैसे कर्मों को बांध रहे, कल और उच्छृलंखता बढ़ेगी। दिशाहीन हो रहे लोगों को रोकना आज अतिआवश्यक है।
पत्रकांड पर भी लगे विराम
जैसे आचार्य श्री के प्रति अपशब्दों की इस दुर्घटना को 72 घंटे में पटाक्षेप करने में जगत पूज्य ने कदम उठाये, उसी तरह आचार्य श्री व कुछ संतों की स्वच्छ छवि पर गंदे पत्रों से कीचड़ उछालने वाले पत्रकांड का भी खुलासा कर, विराम लगाने की आवश्यकता है और उस पर मौन की बजाय दोषियों से क्षमा मंगवाकर उसका भी पटाक्षेप किया जाये, तो पर्युषण से पहले क्षमा धर्म की सार्थकता पर उत्तम पहल होगी।
चैनल महालक्ष्मी चिंतन
वर्तमान में सवाल-जवाबों के मंच अपने-अपने नाम, आलोचना, कषायपुष्टि अपनी महत्ता की ओर बढ़ते दिखते हैं, उस ओर यह आवश्यक कदम था। वहीं आज भक्तों को बढ़ाने की नहीं, श्रावकों को बढ़ाने की जरूरत हैं। जैसा आचार्य श्री सुनील सागरजी कहते हैं, छोटे मुंह एक बात की – संतों को कुछ खास भक्तों के प्रभाव से दूर होना चाहिए। आचार्य श्री ने जो ऊंचाई दी, उसको और ऊंचा नहीं कर सकते, तो गिराओ तो नहीं। पदों की लोलुपता पर विराम लगें, श्रमण संघों में खास भक्तों की घुसपैठ ना हो, न ही पूजनीय कान के कच्चे बनें। ऐसे मंचों का दुरुपयोग ना हो। एक कड़वी बात तो यह सामने आ रही है कि जैन ही जैन का जिस तरह विरोध कर रहा है, उतना अगर जैन संस्कृति, विरासत, तीर्थों पर अतिक्रमण हमले वालों पर किया जाये, तो उचित रहेगा। अपने ही लोगों के पुतले लेकर जलने-जलाने का साहस तो कर सकते हैं, पर जो जैनों के ही खिलाफ हो, उसका प्रखर विरोध नहीं करते। और एक बात एक स्वर से, आचार्य श्री की परंपरा में पूजनीय श्री समय सागरजी पूरे संघ के आचार्य थे, हैं और रहेंगे।













