निर्णय भोजशाला : जैनों को हिंदू बना डाला! ॰ जैन धर्म की स्वतंत्र अस्मिता, ऐतिहासिक साक्ष्य और न्याय का एक गंभीर विश्लेषण

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॰ जैन प्रमाण कर दिये गौण, अदालत रही मौन
न्याय में तीन बड़ी विसंगतियां :
1. जैन हिंदू की शाखा है
2. लंदन म्यूजियम में साक्षात प्रमाणों को हिंदू में शामिल करना, इग्नोर करना
3. हिंदू पक्ष के लिये रतलाम दिगंबर जैन मंदिर का भ्रामक उदाहरण

19 मई 2026 / जयेष्ठ शुक्ल तृतीया/चैनल महालक्ष्मी और सांध्य महालक्ष्मी/

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इन्दौर पीठ) द्वारा न्यूट्रल साइटेशन संख्या: 2026:MPHC-IND:8805 (WP-10497-2022) शुक्रवार 15 मई को धार (मध्य प्रदेश) के ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर आया उच्च न्यायालय का निर्णय विधिक और ऐतिहासिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। इस निर्णय के पृष्ठ 234 और 235 (पैराग्राफ 200 से 205) में जैन धर्म, उसकी प्रतीकात्मकता और हिंदू धर्म के साथ उसके संबंधों पर कुछ ऐसी टिप्पणियां की गई हैं, जिसने संपूर्ण जैन समाज को उद्वेलित और मर्माहत किया है। आज सान्ध्य महालक्ष्मी इस निर्णय का जैन दृष्टिकोण से निष्पक्ष, संवैधानिक और ऐतिहासिक विश्लेषण करने का प्रयास कर रहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि न्यायालय द्वारा जैन धर्म को हिंदू धर्म की एक ‘शाखा’मात्र मान लेना किस प्रकार ऐतिहासिक साक्ष्यों और पूर्ववर्ती न्यायिक मिसालों के साथ अन्याय है।

1. विधिक विसंगति: क्या जैन धर्म हिंदू धर्म की एक शाखा है? बिल्कुल नहीं, तो क्यों?
न्यायालय ने अपने निर्णय के पैराग्राफ [200] और [205] में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 2(1)(a) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(1) का हवाला देते हुए कहा है कि: ‘जैन धर्म और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का हिस्सा माना गया है… जैन धर्म वास्तव में हिंदू धर्म की ही एक शाखा है।’

॰ यह निष्कर्ष विधिक और संवैधानिक दोनों ही स्तरों पर त्रुटिपूर्ण प्रतीत होता है: संवैधानिक मर्यादा (अनुच्छेद 25): भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (स्पष्टीकरण कक) के तहत व्यक्तिगत कानूनों को लागू करने के उद्देश्य से जैन, बौद्ध और सिखों को ‘हिंदू’ शब्द के दायरे में शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य केवल सामाजिक सुधार और विधि की एकरूपता था, न कि जैन धर्म के स्वतंत्र धार्मिक अस्तित्व को समाप्त करना, क्या यह निर्णय स्वतंत्र अस्तित्व का हनन नहीं?

सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायलय के 10 से अधिक ऐतिहासिक निर्णय:
बाल पाटिल बनाम भारत संघ (2005): इस ऐतिहासिक मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि जैन धर्म एक स्वतंत्र और प्राचीन धर्म है। अदालत ने इसे हिंदू धर्म का हिस्सा मानने के विचार को खारिज किया था। कमेटी आॅफ मेनेजमेंट कन्या जूनियर हाई स्कूल बनाम उ.प्र. में 21 अगस्त 2006 को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा ‘जैन धर्म निर्विवाद रूप से हिंदू धर्म का भाग नहीं है।’ हीराचंद गंग जी बनाम राउजी सोजपाल (1939) में बंबई हाईकोर्ट ने कहा कि जैनों को मूलत: हिंदू मानना एतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से गलत है। समय-समय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने जैन धर्म की ‘श्रमण परंपरा’ को ‘वैदिक परंपरा’ से सर्वथा भिन्न और प्राचीन माना है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दर्जा (2014): भारत सरकार ने 27 जनवरी 2014 को एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर जैन समुदाय को ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक’ का दर्जा दिया था। यदि जैन धर्म हिंदू धर्म की ही एक शाखा होता, तो उसे भारत के संविधान और सरकार द्वारा एक पृथक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के रूप में मान्यता देना संभव नहीं होता। ( तो क्या जैन साक्ष्यों को हिंदू की शाखा कहकर नकारा गया।)
प्रधानमंत्री कार्यालय (सबसे पहले 1950) और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा दिए गए विभिन्न ज्ञापनों में भी जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान को बार-बार रेखांकित किया गया है। अत: न्यायालय द्वारा व्यक्तिगत कानूनों की परिभाषा को धार्मिक और दार्शनिक विलय का आधार बना लेना विधिक रूप से न्यायसंगत नहीं है।

2. लंदन संग्रहालय की ‘अम्बा/विद्यादेवी’ प्रतिमा और शिलालेख की अनदेखी
निर्णय के पैराग्राफ [205] में लंदन संग्रहालय में रखी सफेद संगमरमर की मूर्ति (म्यूजियम संख्या: 1880.349) का उल्लेख है। न्यायालय ने माना कि इस मूर्ति की पृष्ठभूमि में ‘पद्मासन’ मुद्रा में बैठे 5 जैन तीर्थंकरों या साधकों की उपस्थिति ‘पूरी तरह से स्वाभाविक है, क्योंकि जैन धर्म हिंदू धर्म की ही एक शाखा है।’ यह व्याख्या पुरातत्व और मूर्तिविज्ञान के सिद्धांतों के पूर्णत: विपरीत है।

जैन मूर्तिविज्ञान और शासन देव/देवी: जैन परंपरा में प्रत्येक तीर्थंकर के साथ उनके यक्ष और यक्षिणी (शासन देवी) होते हैं। जैन धर्म में ‘अम्बिका देवी’ (जो आम्रवृक्ष और सिंह की सवारी से पहचानी जाती हैं) और ‘श्रुतदेवी/वाग्देवी’ (ज्ञान की अधिष्ठात्री विद्यादेवी) की पूजा की अत्यंत प्राचीन परंपरा है। किसी भी प्रतिमा के शीर्ष या पृष्ठभूमि में पांच जैन तीर्थंकरों का पद्मासन मुद्रा में उत्कीर्ण होना अकाट्य प्रमाण है कि वह प्रतिमा मूलत: जैन देवकुल की है। हिंदू मूर्तिविज्ञान में किसी भी देवी (जैसे सरस्वती या दुर्गा) के सिर पर जैन तीर्थंकरों को बिठाने का कोई शास्त्रीय विधान नहीं है। (ऐसी भारत में कोई प्रतिमा नहीं बनी, जिनमें हिंदू देवता में तीर्थंकरों की प्रतिमा उकेरी हो। हां, ऐसे जरूर प्रमाण सामने आये हैं, जहां तीर्थंकरों के यक्ष-यक्षिणी को हिंदू देवी-देवता में बदला गया, 8वीं सदी से आज तक सैकड़ों बार।)

लंदन संग्रहालय के साक्ष्य और शिलालेख: लंदन संग्रहालय के रिकॉर्ड्स और इस प्रतिमा पर उत्कीर्ण तत्कालीन शिलालेख (शिल्पकार वररुचि और परमार राजा भोज के काल का) का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो वह इसे स्पष्ट रूप से जैन संस्कृति से जोड़ता है। इस मूर्ति को ‘जैन विद्यादेवी’ या ‘अम्बिका’ के रूप में ही पुरातत्वविदों द्वारा चिन्हित किया गया है। न्यायालय द्वारा इस स्पष्ट जैन प्रतीक विज्ञान को यह कहकर दरकिनार कर देना कि यह ‘हिंदू देवी की पृष्ठभूमि में जैन तत्व’ है, जैन समाज के ऐतिहासिक सांस्कृतिक अधिकारों का हनन है।

3. रतलाम दिगंबर जैन मंदिर का भ्रामक उदाहरण और ऐतिहासिक यथार्थ
निर्णय के पैराग्राफ [200] में न्यायालय ने रतलाम (मध्य प्रदेश) के एक जैन मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां जैन मंदिर के भीतर शिवलिंग और भगवान गणेश की मूर्तियां स्थापित हैं, जो दोनों धर्मों के एक होने का प्रमाण हैं।

जैन समाज के प्रामाणिक दस्तावेजों और स्थानीय इतिहास के अनुसार यह संदर्भ अत्यंत भ्रामक है: कारण और हकीकत क्या?
यक्ष-यक्षिणी बनाम हिंदू देवी-देवता: जैन मंदिरों में तीर्थंकर पार्श्वनाथ के रक्षक देव ‘धरणेंद्र यक्ष’ और ‘पद्मावती यक्षिणी’ होते हैं। धरणेंद्र यक्ष के मस्तक पर सर्पछत्र होता है। अज्ञानतावश या सतही तौर पर देखने वाले लोग कई बार इन्हें ‘शिव’ या ‘नागदेवता’ समझ लेते हैं। इसी तरह, कुछ जैन यक्षों के स्वरूप को ‘गणेश’ जैसा समझ लिया जाता है, जबकि वे मूलत: जैन शासन देव होते हैं।

बाद के अतिक्रमण का इतिहास: रतलाम के संदर्भित मामले में ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि वहां मूलत: पार्श्वनाथ भगवान का प्राचीन मंदिर था। वर्ष 1954 या उसके आस-पास, कुछ असामाजिक तत्वों या बाहरी ताकतों द्वारा सांस्कृतिक समावेशन या कब्जे के प्रयास के तहत वहां जबरन शिवलिंग या अन्य मूर्तियां स्थापित करने की कोशिश की गई थी, जिसका जैन समाज ने कड़ा विरोध किया था। न्यायालय ने 1957 में, इस बाद के विवादित घटनाक्रम को ‘ऐतिहासिक सह-अस्तित्व’ मानकर अपने निर्णय का आधार बना लिया, जो कि इतिहास का विद्रूणीकरण है।

जैन मंदिरों के रूपांतरण के ऐतिहासिक उदाहरण: इतिहास गवाह है कि भारत में कई स्थानों पर जैन धर्म के अहिंसक स्वरूप का लाभ उठाकर उनके प्राचीन मंदिरों को अन्य संप्रदायों में परिवर्तित कर दिया गया:-
दक्षिण भारत के उदाहरण: इतिहासकार डॉ. पी.बी. देसाई और लुईस कोर्ट के शोध बताते हैं कि कर्नाटक और तमिल भाषी क्षेत्रों में कई प्राचीन जैन बसदि (मंदिरों) को बाद के काल में शैव या वैष्णव मंदिरों में बदल दिया गया (जैसे कल्याणी के चालुक्य काल के अनेक मंदिर)।

मूर्तियों पर सिंदूर लेपन: उत्तर और मध्य भारत में अनगिनत जैन तीर्थंकर प्रतिमाओं और यक्षिणियों पर मोटा सिंदूर लेपकर उन्हें ‘हनुमान’, ‘भैरव’ या ‘दुर्गा’ के रूप में पूजने के मामले आज भी सामने आते हैं, जिससे उनकी मूल जैन पहचान छिप जाती है। (इस पर आज तक अदालतों द्वारा कोई कठोर कार्रवाही इनको स्वत: संज्ञान लेते हुए नहीं की गई।)

4. अब क्या है, जैन समाज के लिए भावी मार्ग: यह समय जैन समाज के लिए आक्रोश का नहीं, बल्कि अत्यंत विवेक, धैर्य और बौद्धिक दृढ़ता के साथ कार्य करने का है। अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए जैन समाज को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:-

क. विधिक स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय में अपील: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के इस निर्णय के उन हिस्सों (पैराग्राफ 200 और 205) को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की जानी चाहिए, जो जैन धर्म को हिंदू धर्म की शाखा बताते हैं। यह बाल पाटिल (2005) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के अपने ही फैसले की अवमानना है।

विधिक विंग का गठन: समस्त जैन संप्रदायों (दिगंबर व श्वेतांबर समुदायों) को मिलकर एक ‘केंद्रीय विधिक सेल’ बनाना चाहिए जो देश भर में जैन धरोहरों से जुड़े मामलों की पैरवी करे।

ख. अकादमिक और शोध के स्तर पर मूर्तिविज्ञान लंदन संग्रहालय में रखी भोजशाला की वाग्देवी/अम्बा प्रतिमा के शिलालेखों का प्रामाणिक अनुवाद और मूर्तिविज्ञान के आधार पर एक विस्तृत ‘श्वेत पत्र’ वैश्विक स्तर के पुरातत्वविदों के माध्यम से तैयार करवाया जाए। धरोहरों का सर्वेक्षण: भारत के उन सभी जैन मंदिरों और प्रतिमाओं का डिजिटल और जीपीएस-आधारित दस्तावेजीकरण किया जाए, जिनका या तो नाम बदल दिया गया है या जहां अतिक्रमण की स्थिति है।

ग. सामाजिक और सांप्रदायिक सद्भाव: जैन समाज का यह संघर्ष किसी अन्य समुदाय या बहुसंख्यक हिंदू समाज के खिलाफ नहीं है। जैन धर्म सदैव ‘अनेकांतवाद’ (सहिष्णुता और बहु-दृष्टिकोण) का समर्थक रहा है। अत: हिंदू समाज के प्रबुद्ध विचारकों और संतों के साथ संवाद स्थापित कर उन्हें यह समझाना चाहिए कि जैन धर्म की स्वतंत्र अस्मिता को बनाए रखना, सनातन संस्कृति की विविधता को समृद्ध ही करता है, कमजोर नहीं।

इस बारे में पूरी रिपोर्ट चैनल महालक्ष्मी के एपिसोड नं. 3718 में देख सकते हैं।

चैनल महालक्ष्मी चिंतन:
भारत की भूमि ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर चलती है। जैन धर्म ने इस देश को अहिंसा, अपरिग्रह और स्याद्वाद जैसे अमूल्य रत्न दिए हैं। जब देश की अदालतें अनजाने में या साक्ष्यों की अधूरी व्याख्या के कारण एक अत्यंत प्राचीन और स्वतंत्र संस्कृति के अस्तित्व को किसी अन्य में विलीन करने का प्रयास करती हैं, तो यह केवल एक समुदाय के साथ नहीं, बल्कि भारत की बहुसांस्कृतिक आत्मा के साथ अन्याय होता है। जैन समाज आज भारत के सभी समुदायों, न्यायविदों और प्रबुद्ध नागरिकों से अपील करता है कि वे ऐतिहासिक सत्यों को स्वीकारें। हमारी स्वतंत्र अस्मिता को बनाए रखना ही भारत की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता और अनेकता में एकता की गारंटी है। न्याय वही है जो सत्य को उजागर करे, न कि वह जो इतिहास की परतों के नीचे दबे सच को सुविधानुसार बदल दे।
(इस शोधपूर्ण लेख पर पाठकों की प्रतिक्रिया का व्हाट्सअप नं. 9910690825 पर इंतजार रहेगा, यह जैन समाज के अस्तित्व के लिए एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।)